कानपुर की गलती सर्दी की विदा लेते मुझे बस में बैठते ही अकस्मात ये ख्याल आया कि इस बार छुट्टियों में क्रिकेट नहीं खेला। और सोचने पश्चात कुछ ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ी। स्वरूप नगर की सर्द गलियों को भी अपने राइट हैंड सीमर और लेफ्ट हैंड बैटर की ग़ैरहाज़री में किसी मैच का दर्शक बनना स्वीकार ना था। मेरी गलियों को भी अपने सीनियर खिलाड़ी की कमी उतनी ही ख़ली जितनी मुझे अपने सबसे पुराने दोस्त की। इस बार सर्दियों की छुट्टियों में अली घर नही आया।
शीत लहर में कोहरे को शॉल सा ओढ़े अपने शहर को छोड़ते समय मैंने इस हकीकत के साथ समझौता किया कि मैं अब बड़ा हो गया हूँ। बचपन को याद करना अब किसी तालाबी शीशे में झाँकने जैसा लगता है, जिसमे एक विकृत प्रतिबिम्ब में मुझे अक्सर अपना चेहरा ढूँढना पड़ता है। पुरानी यादों में खो जाना टूटे काँच को हाथ से बटोरने सा है — ख़ून भी आ जाएगा और सारे बितरे साफ़ भी होने से रहे। टूटे काँच को नजरंदाज करने में भी कई नुक़सान हैं; आए दिन ख़ुद ही के तलवे में घुसेगा। खाल पिरोद के मास में दफ़्न हो जाएगा। इन्हीं कारणोंवश मैं अक्सर शीशें तोड़ने के बाद उस कमरे पे ताला मार देता हूँ — जगह भले ही कम बचे परंतु कम से कम चुभने के डर और बटोरने की ज़िम्मेदारी से तो मैं अपने हाथ साफ़ कर सकता हूँ।
31 दिसम्बर को रात के 11:50 बजे मेरा फ़ोन ऐसे बजा कि मानों उन्हीं बंद कमरों में से किसी एक का किवाड़ कोई अंदर से कूट रहा हो। फ़ोन उठाने के कुछ पल बाद मुझे एक और यादगार सीख मिली — आदमी हमेशा एक सा सिसकता है, भले ही वह रो रहा हो या हस रहा हो। शायद इसी कश्मकश से उभरने के लिए इंसानों को बात करते समय कान और मुंह के अलावा आँखें भी बख़्शी गई हैं। किसी से आँखे मिलाकर बात करने पर कल्पना के लिए बहुत कम गुंजाइश रह जाती है। पर अब उन्नति और उत्पादिकता ने सारी बात-चीयत को सिर्फ़ कान और मुंह के हवाले छोड़ दिया है — हर व्याख्यान की सारी इंसानियत मानो किसी संवाद में सिमट गई है।
जब दिल्ली यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं के बीच अली ने मुझे बताया कि वह नया साल मनाने अपने दोस्तों के घर जा रहा है तो मैं काफ़ी ख़ुश था | मेरे मिलनसार दोस्त को अपने नए साल का आगमन सिर्फ़ चार दीवारों के साथ नहीं करना पड़ेगा ।अली अक्सर लोगों को अपनी ओर रिझाने में काफ़ी माहिर रहा है — उसके हर दोस्त को लगता है कि अली ही उसका सबसे करीबी यार है। कभी-कभी उसकी इसी विशेषता से मुझे काफ़ी तकलीफ़ भी होती थी — अगर अली सब ही के साथ पानी सा घुल-मिल लेता तो फिर किसी चार दिन पुरानी यारी और हमारी बचपन से कबूली रिश्तेदारी में क्या फ़र्क़? पर जब उसने नया साल का सबसे पहला फ़ोन अपने सबसे पुराने मित्र को लगाया — सिसकते हुए — माफ़ी माँगते कि वह इस साल हमसे मिल ना सका; तो मुझे यकीन हो गया कि मैं वाक़ई में उसकी असल यारी का हकदार हूँ। हस्ते हुए तो आप ज़माने को चेहरा दिखा सकते, पर टूटकर रोते हुए कोई आदमी भला किस से ही बात कर सकता? मुझे नही लगता कि मैं कभी किसी के सामने इतनी शिद्धत से बिखर पाऊँगा । लेकिन मैं खुशनसीब हूँ की मेरे दोस्त मुझे इतना सुलझा समझते हैं कि उन्हें मेरे सामने कमजोर होने से कोई शिखवें नहीं हैं।
छुट्टियों से कुछ महीने पहले, नौकरी लग जाने का जश्न मनाने मैं चार दोस्तों संग दिल्ली गया था। अली हमारी खातिरदारी का ज़िम्मा किसी रिश्ते सा निभाने की आस में हमसे भी ज़्यादा ख़ुश था। स्टेशन पर उतरने से मेट्रो में बैठके और फिर 2.5 मील चलके मुझे दिल्ली की कुछ समझ महसूस होने लगी। दिल्ली के लोगों के रवैया को मैं उसी शहर की ठुसी हुई अतिप्रजन गलियों के दर्पण में फिर भांपने सा लगा। एक गलियारा जहाँ चलने की सहूलियत नहीं, वहीं कई पुश्ते पल जाती हैं और एक ही किराने की दुकान को अपनी ख़ानदानी धरोहर बनाये उस किराए की रईसी पे भी इतराती हैं। और अगर हम एक शहर और उसके वासियों को एक धारणा में समेट सकें तो काफ़ी साफ़ रूप से झलकता है कि हमारे इस महान देश की राजधानी का नाम दिल्ली क्यों है। यहाँ बसी हर अंतड़ी-ग्रंथि अपने आप को हृदय सा महत्वपूर्ण आंकती हैं — जब तक उनका संक्रमण रोकने के लिए उन्हें शरीर से नोचकर इंसानियत से निजात ना कर दिया जाये।
शादीपुर में मेट्रो खम्बा न० 30 के सामने एक गली कटती है जिसमे रणजीत नाम के आदमी ने अपना पूरा घर कॉलेज के बच्चों को छोटे कमरे महंगे किराए पर देने के लिए उठा दिया है। अली उसे डैडी रणजीत कहता है क्यूंकि वह अक्सर ही किसी बहाने अपने किरायेदारों से लड़ने आ जाता है। मकान में घुसते ही एक माला उतरकर तहख़ाने में एक 10X10 का कमरा है जिसमे अली को अपने 4 साल की डिग्री पूरी करनी है। इस कमरे में एक छोटी सी रसोई और बाथरूम भी जुड़े हैं। और इधर मैं अपने चार दोस्त लेके रुकने आया था — शुभावसर पे अली ने भी अपना एक दोस्त बुला लिया था। बगल के एक टेंटहाउस से मैं और मेरा दोस्त 4 गद्दे किराए पर ले आए। जब मैं पैसे देकर अकेला लौट रहा था तब एक स्मैकिया मुझसे रगड़कर चलने लगा। उसकी चोरी की फ़िराक़ समझने में मुझे उतना ही समय लगा जितना भाग के वापस अपने दोस्त के घर जाने में। लौट के आने पर अली हमसे बार-बार पूछ रहा था कि हमे ज़मीन पर सोने से कोई दिक्कत तो नहीं — हमने उसे समझाया कि हम एक इंजीनियरिंग कॉलेज में लड़को के हॉस्टल में रहने वाले छात्र थे तो हमें ज़मीन पर सोने से ज़्यादा अजीब उसकी फ़िक्र लग रही थी।
बहार जाते समय अली ने हमे समझाया कि हमारी वेश-भूषा एक भारतीय इंजीनियरिंग छात्र का मानवीकरण कर रही थी जो की एक बी०कॉम० छात्र का तरीका था हमे जाहिल बोलने का। अली ने हमे बहार पहनने के लिए अपने कपड़े और जूते दिए। फिर सजाकर मानो किसी बड़े की तरह वह हमे दिल्ली घुमाने ले गया। जामा बाज़ार में एक घंटे में 6 जगह खाने के बाद — हमे बहुत लोगों ने चोरों सा घूरा, सीधे मौत के गाने सुनते हुए हम आगे एक रिक्शा में रवाना हुए। जामिया में ग़ज़ब के स्मैश बर्गर और फ्राइज़ खाने के बाद अली ने हमें और आगे के लिए पूछा। अगले दिन जब हम मजनू के टीले पर बेकन-सीज़र सलाद खा रहे थे, तो अली ने मुझसे पूछा कि छोटे में उसको क़ुरान पढाने जो मौलाना साब आते थे वह अभी क्या कहते। मैंने अली को याद दिलाया कि मौलाना साब को पढाने से ज़्यादा रुचि हमारे साथ क्रिकेट खेलने में थी। यह सुनकर अली हसा और बोला कि अगर मौलाना साब हमारे साथ दिल्ली घूम रहे होते तो वह हौज-ख़ास पे लड़कियों का सजदा करने में मशरूफ़ हो जाते। ना कोई इल्म किताबें पढ़ी, ना मक्के जाकर हज करा — अली ने सिर्फ़ यारों को राज़ी करना ही मज़हबी रूप से निभाया है। शुक्र है भगवान का।
खाने को हलक तक भरके अली हम सबको अपनी पसंदीदा जगह दिखाने ले गया। रात के बारह बजे जब दिल्ली के पतझड़ की सर्द हवाएं मेरे बालों को एक प्यारी लड़की की तरह सहला रहीं थीं तब मुझे समझ में आया कि यह मामूली सा फुटपाथ अली की मनपसंद जगह क्यों है। एक पराये शहर में क्यों इस एक जगह पे वो अपने घर से ज़्यादा हक़ झाड़ रहा था। मेरे दायें ओर था हमारे देश की संसद और बायें ओर इंडिया गेट। अली मेरी तरफ़ मुड़ता और बोलता कि सोचो कितने बड़े मुकाम हमारे देश ने हासिल किए हैं जो इसी सड़क के ऊपर से गुज़रें हैं। मैंने इस बारे में सोचा। फिर सोचा कि कैसे अब वो देश खंडित हो रहा है, उसकी जगह एक नया राष्ट्र बन रहा है। इस नए राष्ट्र में एक नई संसद भी होगी। एक नई संसद की स्थापना को हमारी सरकार ने एक नया सवेरा बताया है — सरकार तो सही ही बोलती है पर मैं नहीं मानता कि इससे पहले हमारे देश में कभी सूरज ही नहीं निकला। माना कि इमारत अंग्रेज़ी है किंतु क्या आज़ादी के बाद से अभी तक अँधेरा ही था? क्या नेहरू, पटेल, गांधी, कलाम, वाजपेयी — क्या ये सब चमगादढ़ थे जो एक स्याह मुल्क को विदेशी चूलों पर परोस रहे थे? क्या इस बात की संतुष्टि को ही सुबह कहते हैं कि अब जिस भट्टी में ये देश सुलघ रहा है उसपे “मेड इन इंडिया” की मोहर लगी होगी? चलों शायद इसी वाक्य को लालटेन बतायें कि अब कम से कम इस देश के टुकड़े करने और बेचने वाले नहीं परंतु ख़रीदने वाले भी सौ-फ़ीसदी हिंदुस्तानी हैं। अली को ये सब बातें फ़िज़ूल लगती — या फिर वो मेरी तरह एक पंडित घर में ना पैदा होने के कारण ऐसा दिखता। वह सिर्फ़ खड़े हुए इंडिया गेट को निहारे जा रहा था। एक दम से मेरी ओर मुड़ा और बोला: भाई कितने मूर्ख होते होंगे ना वो लोग जो पढ़ने बाहर जाते हैं। मैं सिर्फ़ मुस्कुराया।
लौटते समय मुझे वापिस किसी स्मैकिये से मुठभेड़ का ख्याल खाये जा रहा था। मैंने अली से पूछा कि उसने अपने कॉलेज के पास ही कोई जगह क्यों नहीं ले ली। उसने हस्ते हुए मुझे सूचित किया कि अच्छे मुहल्लों में मुसलमानों को बुरा किराएदार मानते हैं। मेरे चेहरे पे आशंका पढ़ने के बाद वह ख़ुद ही आगे से बोला कि सही भी है — अगर वो हिंदू होता तो उसे भी दिक्कत होती, भरोसा नहीं कर सकते। मैंने कभी सोचा भी नहीं कि मेरे उपनाम से किसी को इस कद्र दख़्ल हो कि वह मुझसे पैसे लेकर भी मुझे रुकने की जगह ना दे। क्या मैं इतना खुदगर्ज़ था कि ख़ुद के अधिकारों से भी अनजान था या फिर दूसरों के हालातों से अपरिचित रहना भी मेरा इस देश में एक जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। मैं नीचे देखने लगा और अली के दोस्त से पूछा उसका कितनी दफा ऐसे ही अली के साथ रुकना होता है। वह मुझसे बोलता कि भैया मैं हर हफ़्ते ही घरवालों से झूट बोलकर आ जाया करता हूँ। मैंने पूछा अगर वह पढ़ाई के कारण घर पे झूट बोला करता है। उसने बताया कि उसके घर वालों को उसके अंकों से कोई दिक्कत नहीं परंतु एक मुसलमान के साथ रहने से है। उसके घरवालों को पता है वो पढ़ता नहीं तो अंकों का क्या ही करेंगे पर एक मुसलमान के साथ रहते-रहते अगर खतना हो गया तो ज़्यादा मुसीबतें आन पड़ेंगी। ऐसे ही हस्ते हस्ते हम लोग वापिस अली के घर आ गए।
घर में कदम रखते ही मुझे सूझा की अली के कमरे में कोई खिड़की नहीं है। बिना घड़ी के आप अली के कमरे में यह भी नहीं बता सकते थे कि चार सुबह के बज रहे थे या शाम के। शायद इसलिए वह अक्सर बेवक्त मुझे फ़ोन करा करता है, और कोसता है जब मैं ना उठाऊँ। मुझे उसकी जीवावस्था किसी पीड़क-जंतु सी लगी जो बिना सूरज के ज़मीन के नीचे रहता, सोता और खाता है। और देखने पर मुझे इस बात का भी कष्ट हुआ कि सलाह करने के लिए अली पे कोई जानमाज़ भी नहीं है। जब मैंने उससे इस बारे में पूछा तो हस्ते हुए मुझसे बोलता कि भाई मैं बुरा मुसलमान हूँ, मैं ये सब नहीं करता। मैं भी क्या ही कहता? भला मैंने कौन से बहुत पंडित धर्म निभायें हैं जो किसी और की श्रद्धा पे टिपड़ी करूँ। परंतु, ख़ुद के नास्तिक होने की बावजूद भी जब कोई ऐसा व्यक्ति मुझे मिलता हो जिसका भक्ति भाव से मन उठ गया है तो मुझे दुख बहुत होता है। शायद किसी सूफी कवाली में सुना था कि जो गाना गाता है वो दो बार पूजा करता है — काश मुझे भी गाना आता क्यूंकि प्रभु पूजे तो अरसे बीत गए हैं। पर अली में इतनी नैतिकता तो है कि उसे समझ में आ जाए कि संविधानिक दृष्टिकोण से वो बुरा नहीं बल्कि अच्छा मुसलमान है। हमारे देश में एक अच्छा मुसलमान होने कि क्या हाजतें हैं? एक अच्छा हिंदुस्तानी मुसलमान सजदा नहीं करता, उसे झटके और हलाल में कोई फ़र्क़ नहीं, वह बिना किसी आपत्ति की जय श्री राम बोल सकता है, जिसके ज़्यादातर दोस्त हिंदू हैं, देशभक्ति के ऊपर बनी पिक्चरों को देखकर उसकी धार्मिक भावनाओं को क्षति नहीं पहुँचती, उसे सरकार से कोई शिकायतें नहीं, जो पाकिस्तान को गाली दे, जिसे दारू पीने से कुछ ख़ास ऐतराज़ ना हो, जो औरतों के चरित्र पे सवाल ज़रूर उठाये पर बुरखे और तीन तलाक में ना माने, जो वक़्फ़ की ज़मीनों के लिए कोई हक़ ना जमाए, जिसे टूटे मस्जिदों से कोई दिक्कत ना हो, जो नए मंदिरों की ईंट लगाये, जिसे भजन आते हों और जिसपे अपने हिंदुस्तानी होने का काग़ज़ी समूद हो। हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में एक अच्छा मुसलमान वही है जो रत्ती भर भी धार्मिक हो ही ना। तो इन्ही मायनों के तहत, मुझे अली को बताना है की वह एक अच्छा मुसलमान है। उसके नाम को छोड़के इस देश को उसके अस्तित्व से कोई ख़ौफ़ नहीं है। काश एक अच्छा हिंदू होना भी इतना आसान होता तो मुझे भी बिना टीका लगाए और दूसरों को धमकाए एक अच्छे ब्राह्मण का सर्टिफिकेट मिल जाता। अगले दिन जब ऑटो में बीटल्स के गाने सुनते हुए हम स्टेशन कि ओर वापिस जा रहे थे तो मैंने अली की नम पलकों को देखा। मैंने हम दोनों की मर्दानगी के खातिर कुछ बोला नही। बस अपने उन्हीं यादों के कमरे के एक महफ़ूज़ हाशियों में उस दृश्य को भी हिफ़ाज़त कर दिया।
जब कॉलेज आने के बाद अली बी मुझे ऋषिकेश से वीडियो कॉल किया तब मैं बहुत ख़ुश था कि अब ये अपनी रुआसी से इस कद्र उभर गया है कि पहाड़ों कि सैर लगाने निकल गया। मेरे फ़ोन उठाते ही बोलता कि भाई सोचा तुम्हें गंगा आरती लाइव दिखादूँ। मैं ज्यादा कुछ देख नही पा रहा था तो मेरी खामोशी टोक के कहता कि भाई फ़ोन पे भले ही ना दिख रहा हो पर ये उसके जीवन के सबसे तर कर जाने वाले लम्हों में ये एक है। मैंने उसे जब बताया कि मैं भी लैण्डोर गया था घूमने तो मैंने भी ऐसे कई दृश्य देखे तो मुझे टोक के बोलता कि भाई लैण्डोर में मुझे अंग्रेज़ों की धरोहर पे धूप सेकनी पड़ी थी, पर ऋषिकेश में वह भारतीय संस्कृति में डुबकीयाँ लगा रहा था। जब मैंने पूछा कि उसने और क्या-क्या किया तो मुझे बताता कितने अन्य मंदिर घूम के आया। और जब वह नंदी जी के कान में अपनी इच्छा सच करवाने गया तो नंदी जी स्वयं उसे बोले कि “अबे तुम तो इंपोस्टर हो!” मैंने हस्ते हस्ते उससे पूछा कि भाई मांगा क्या यह भी बता दो तब मुझे कहता है कि भाई ऐसे सच थोड़ी ना होगा।
मुझे एक राष्ट्रीय चुनाव अभियान के समय बड़ा होते हुए ऐसे ही एक दिन पता चला था कि अली मुसलमान है। मेरी ज़िंदगी में इससे कुछ ख़ास असर नहीं आया। पर अली की शायद बदल सी गई। मैं ख़ुद को ग्यारह वर्ष की उमर में इतना आगाह ना होने दोषी नहीं ठहराता — पर मैं अगर अब भी सुखद रूप से अंधा घूमता रहा तो ज़रूर एक बुरा दोस्त होने का कसूरवार रह जाऊँगा। आजकल जो भाषा और नामों पे लड़ते हैं उन्हें यह तक नहीं पता जलने और दफ़्न होन से मंज़िलें नहीं बदलती और शाब्दिक उस रास्ते में रह जाती है सिर्फ़ एक चुप्पी। मैं भगवान में नहीं मानता पर दोस्ती के ख़ातिर मैं नंदी जी के कान में सिर्फ़ यह बोलूँगा कि प्रभु ,मैं एक ऐसे देश में पैदा हुआ जहाँ मेरा भाई अली है — आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।



i will never recover from this. i will confess, the last time I read something in Hindi by myself was probably machli jal ki raani hai, so obviously i struggled. but all thanks to the TTS.
i remember you telling me about your trip to delhi, a very thrilling one. how could a thrilling experience excavate such a soul deep truth and debate on religion and politicised discourse that's being sold in the contemporary times. we live in a world where the nation that celebrates and takes pride in diversity is so cracked to the core, that now it boasts about the difference they inhabit.
my heart hurts a little bit, not going to lie. you know how you read something so great it kind of changes you and alters your brain chemistry a little? this is one of that. you're a genius.
also, there's this poem in bengali by Kaji Nazrul Islam called, "মোরা এক বৃন্তে দু'টি কুসুম হিন্দু-মুসলমান।" this piece reminded me of that poem.
i still have to process this piece of yours. it's so wonderfully bittersweet, it's amazing.
Its been ages since I read something in hindi and this was so beautiful.